धरती के तापमान में इजाफा हो रहा है। इसके चलते ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे। लिहाजा समुद्र तल बढ़ने से तटीय शहरों के डूबने का खतरा है। अब वैज्ञानिक सूर्य की रोशनी का असर कम करने पर विचार कर रहे हैं ताकि धरती का तापमान कम रह सके और ध्रुवीय बर्फ न पिघले। इसके लिए वैज्ञानिक वायुमंडल में स्ट्रैटोफेरिक एयरोसोल का छिड़काव करेंगे ताकि जमीन पर सूर्य का प्रकाश कम हो जाए।
सूक्ष्म ठोस कणों या तरल बूंदों की हवा या किसी अन्य गैस में मिश्रण को एयरोसोल कहा जाता है। धुंध, धूल, हवा में मौजूद प्रदूषक और धुआं एयरोसोल के उदाहरण हैं। हार्वर्ड और येल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का यह शोध जर्नल एन्वायरमेंट रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वायुमंडल में एयरोसोल का छिड़काव करने से मौजूदा ग्लोबल वॉर्मिंग आधी हो जाएगी।
20 किमी ऊपर छिड़का जाएगा एयरोसोल
योजना के मुताबिक, यह एयरोसोल वायुमंडल की दूसरी परत स्ट्रैटोस्फीयर में धरती से करीब 20 किमी की ऊंचाई पर छिड़का जाएगा। इसके लिए ज्यादा ऊंचाई पर जाने में सक्षम जेट्स, गुब्बारे या लंबी दूरी तक मार करने वाली बंदूकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। एयरोसोल में सल्फेट मौजूद रहेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि फिलहाल शोध पर काम जारी है लेकिन इतनी ऊंचाई पर विमान का जाना मुश्किल है। लिहाजा एयरोसोल को रॉकेट से पेलोड के जरिए भी भेजा जा सकता है।
योजना पूरी होने में 15 साल लगेंगे
एयरोसोल के वायुमंडल में छिड़काव की इस योजना को पूरे होने में 15 साल का वक्त लगेगा। इसमें 3.5 अरब डॉलर (करीब 25 हजार करोड़ रुपए) खर्च होंगे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह महत्वाकांक्षी शोध है लेकिन इसमें अनिश्चितताएं भी हैं। खर्चीले होने से साथ इसमें काफी इंजीनियरिंग कौशल की भी जरूरत पड़ेगी।
खतरे भी हैं
शोधकर्ताओं का मानना है कि एयरोसोल के वायुमंडल में छिड़काव से फसलों पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। इसके परिणामस्वरूप सूखा या मौसम में आश्चर्यजनक बदलाव भी हो सकते हैं। शोध में ग्रीनहाउस गैसों को लेकर भी कोई चर्चा नहीं की गई जो ग्लोबल वॉर्मिंग का प्रमुख कारण है। स्विट्जरलैंड के वैज्ञानिक फिलिप थैलमैन के मुताबिक- क्लाइमेट इकोनॉमिक्स के लिहाज से सोचें तो सोलर रेडिएशन मैनेजमेंट, ग्रीनहाउस उत्सर्जन रोकने से कहीं ज्यादा बकवास है। यह न केवल काफी महंगा है, बल्कि लंबे वक्त के लिए खतरनाक भी है।
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